सफर

                 सफर 



ये कैसा सफर हैं चलती ही जाती हु। 
आगे की और,
रुकने का नाम नहीं लेती 
सब कुछ पीछे छोड़ती 
हुई जाती हु। 
कुछ याद आता हैं तो बस 
अधूरे ख्वाब 
पिता  का आँगन 
अपनों  का प्यार 
दोस्तों  की मीठी यादे,
वो अनकही दासता 
वो गुनगुनी धुप। 
वो फूलो की मुस्कान 
 पंछियो की चहचहाट। 
अब तो रह गई मेरे पास 
केवल मुट्ठी भर धुल। 
 अब तो चलती ही जाती हु 
आगे की  और। 






नीरा जैन 

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